न्यायपालिका में न्याय सभी के लिए बराबर है चाहे अमीर हो या गरीब। नेता हो या अभिनेता। राजा हो या रंक। गुनाह किया है और कोर्ट में जुर्म साबित हो गया तो सजा भी भोगनी होती है। अपराधियों को सजा मिलती है इसीलिए तो लोग न्यायपालिका पर विश्वास करते है। कहते है भगवान के घर देर जरूर है पर अंधेर नहीं है इसी तरह हमारी कानूनी व्यवस्था है, देर जरूर होती है अंधेर नहीं। दोषियों को एक न एक दिन अपने अंजाम तक पहुंचा के ही दम लेती है। चाहे वह कितने ही बड़े ओहदे में ही क्यों न हो। न्यायपालिका में अविश्वास तब होता है जब कोई बड़े ओहदे का अधिकारी या कोई नेता अपना जुर्म अंत तक साबित नहीं होने देता है, गुनाह पर झूठ का परदा ढकने के लिए अपने पहुंच और ओहदे का इस्तेमाल करते है। राजनीतिक संरक्षण लेते है। साक्ष्य को मिटाने की पूरी कोशिश होती है। गुनाहों में परदा डालने के लिए अफसरों पर दबाव बनाया जाता है। तमाम तरह की कोशिश नाकम होने के बाद यदि दोष साबित हो जाते है और जेल जाने की बारी आती है तो दिल का दौरा, सिने में दर्द, सांस लेने में तकलीफ, उम्र का हवाला देकर सजा से बचने की कोशिश शुरू हो जाती है। यानी जब तक गुनाहों पर परदा पड़ा है आराम की जिंदगी, पकड़े गये तो बीमारियां घेर लेती हैं। हाल ही में शिक्षक भर्ती घोटाले में दोषी करार दिए गए हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश सिंह चौटाला जेल पहुंचने के बाद कभी सीने में दर्द की शिकायत कर रहे हैं तो कभी निजी अस्पताल में भेजने की जिद। सीने में दर्द की शिकायत के बाद उन्हें शनिवार शाम सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया। दूसरी तरफ, चौटाला ने अदालत से खुद को मेदांता हॉस्पिटल रेफर करने की मांग की। ओमप्रकाश चौटाला, पुत्र अजय चौटाला व मामले के अन्य दोषी अधिकारियों को तिहाड़ जेल लाया गया है। सीने में दर्द व सांस लेने में तकलीफ की शिकायत के बाद उन्हें शुक्रवार शाम को डीडीयू अस्पताल में भर्ती कराया गया था। जांच के बाद डॉक्टरों ने वापस तिहाड़ जेल भेज दिया था। शनिवार दोपहर को उन्होंने फिर सीने में दर्द व सांस लेने में तकलीफ की शिकायत की। एक बार फिर उन्हें डीडीयू में भर्ती कराया गया, जहां दो घंटे उनका इलाज चला। 78 वर्षीय चौटाला ने सीबीआई की विशेष अदालत में अर्जी देकर अपनी उम्र और बीमारियों का हवाला देकर मेदांता अस्पताल में ही इलाज करवाने की मांग की। शिक्षक भर्ती घोटाले मामले में अदालत ने 16 जनवरी को हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओपी चौटाला सहित 55 आरोपियों को दोषी करार दिया था। अब दोषियों ने अपनी उम्र, बीमारी, पारिवारिक जिम्मेदारियों आदि का हवाला देते हुए कम सजा देने की मांग की। सजा से बचने के लिए बीमारियों का बहाना करने का तो जैसे बड़े रसूखदार लोगों में चलन शुरू हो गया है। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री का बीमारी के नाम पर आराम फरमाना और सजा से बचने के लिए उम्र की दुहाई देना तो नेताओं में आम बात हो चुकी है। इससे पहले भी कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने भी जेल जाते ही बीमार हो गये थे और अस्पताल में भर्ती थे। घोटाले और रिश्वतखोरी करते समय हस्ट-पुस्ट रहने वाले ये नेता जेल यात्रा करने के दौरान ही बीमार हो जाते है। जेल से बहार आते ही फिर हस्ट-पुस्ट हो जाते है। अभी हमरे देश की जेलों की इतनी दुर्दशा नहीं हुई है कि जेल में जाते ही गंभीर बीमारी हो जाये। जबकि भारत में आम और खास के लिए जेलों में भी अलग-अलग बैरक है। उनकों में जेल ही तमाम तरह की सुख सुविधाएं मुहैया करा दी जाती है फिर भी बीमारी का बहाना। जेल जाते ही अच्छे-अच्छों को नानी याद आ जाती है ये तो सुना था पर अब तो जेल जाते ही बीमारी याद आती है वाली कहावत ज्यादा सुनने को मिलेगी, क्योंकि बारी-बारी सभी नेताओं की यही दशा होने वाले वाली है। ऐसा ही 2जी स्पेक्ट्रम मामले में सीबीआई की समन मिलते ही पूर्व टेलिकॉम मंत्री ए. राजा का अचानक तबीयत खराब हो गया था। सरकारी सुख सुविधाओं में रहने के बाद भी अचानक तबीयत होना, वो भी कानूनी झटका लगने के बाद। अब झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की बात करे तो चार हजार करोड़ के घोटाले को लेकर जब आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय की टीम पूछताछ करने लगी तो उनकी भी तबीयत अचानक खराब हो गई। कोड़ा घोटाला करने के वक्त तक तो भले-चंगे थे किन्तु पूछताछ के दौरान अपनी तबीयत खराब होने की शिकायत करने लग गये। उन्हें रांची के अपोलो अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। कई नेता तो गिरफ्तारी की वारंट जारी होते ही अग्रिम जमानत लेकर बैठ जाते है। कानून बनाने वाले उस कानून का तोड़ भी जानते है। उन्हें तो यह पहले ही पता होता है हमारे उपर लगे आरोप भी अस्थाई है क्योंकि शासन भी अस्थाई ही होती है। ज्यादा से ज्यादा पांच साल तक जेल और छूटने के बाद फिर वही खेल। अब न्याय व्यवस्था आम और खास के लिए एक कहां रही। आम आदमी अपने गुनाहों को आसानी से स्वीकार कर लेते है। सजा भोग अपने गुनहों पर पश्चाताप करते है। किन्तु खास अपराधी तो अपना अपराध स्वीकार करने के बजाय न्यायपालिका के कमजोरियों का लाभ उठाते हैं। सजा से बचने के हथकंडे अपनाते है। माननीय उच्च न्यायलय को संज्ञान में लेकर इन मामलों को गंभीरता से लेना चाहिए की अचानक ही क्यों बीमार वे हो जाते है। विचार करने का विषय है बीमार कैदी ही खुद ही कहता है कि मुझे फला बीमारी है मुझे फला अस्पताल में इलाज के लिए जाने दो। मरीज के बजाय वे एक डॉक्टर की तरह स्वास्थ्य सलाह स्वयं के लिए देने लगते है। जेल में बंदियों की तरह रहना तो दूर वहा का खाना-पानी, स्वास्थ्य सुविधाएं सब कुछ वीआईपी। जेल का कानून आम और खास के लिए एक होनी चाहिए। राजा से अपराध हुई तो महज एक भूल और प्रजा ने किया गुनाह हो गया। अपराधियों की सजा में उनके ओहदे को तवज्जों नहीं दी जानी चाहिए। गुनाह किये है तो सजा भी मिले। सजा में भी आरक्षण परंपरा की शुरूवात नहीं होनी चाहिए।
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