30.7.17

अगस्त में रिलीज होगी 4 मनोरंजक मूवी। जब हैरी मेट सेजल, टॉयलेट-एक प्रेम कथा, हसीना, बरेली की बर्फी, ए जेंटलमैन

बॉलीवूड सिनेमा जगत के लिये अगस्त का माह कुछ खास बनता दिख रहा है क्योकि इस महीने पांच बड़ी फिल्में रिलीज हो रही है। जिसमें से 4 फिल्म इंटरटेमेंट से भरपूर है और पांचवीं दाउद की आतंकवाद पर बनाई गई है। माया नगरी में पहली बार ऐसा हुआ की माह की रिलीज सभी फिल्म लगभग एक ही टेस्ट का है। ऐसे में ये देखना बड़ा दिलचस्प होगा की कौन सी फिल्म दर्शकों के बीच अपना छाप छोड़ने में कामयाब होती है। फिल्मों का ट्रेलर देखने से ऐसा लगाता है कि सभी फिल्म एक दूसरे से काफी अलग है, दर्शक चारों फिल्म को अलग-अलग तरह ये एंजवाय करेंगे।
एक साथ अगस्त माह में ही कई मनोरंजक फिल्मों की बारिश लाने के पीछे निर्माताओं का यह भी कारण हो सकता है कि मौसम सुहाना मिजाज और त्योहारों के कारण दर्शक इंटरटेनमेंट के लिये टॉकीज तक आयेंगे। बहरहाल कौन सी फिल्म कितना बिसनेस करता है, उनकी हिट रेङ्क्षटंग पोजिशन क्या है ये तो समय आने के बाद ही पता चलेगा।

          जब हैरी मेट सेजल      
[4 Aug 2017-Jab Harry Met Sejal]

4 अगस्त हो रिलीज हो रही है शाहरूख खान और अनुष्का शर्मा की फिल्म 'जब हैरी मेट सेजल'। फिल्म के निर्देशक और लेखक है निर्देशन इम्तियाज अली। 
निर्माता गौरी खान की फिल्म 'जब हैरी मेट सेजल' से पहले शाहरूख और अनुष्का को 'रब ने बना दी जोड़ी' और 'जब तक है जान' में एक साथ देखा गया था।

फिल्म में एक अलग तरह की लव स्टोरी को दिखाय गया है जिसमें हरिंदर सिंग नेहरा जो कि यूरोप में टूरिंग गाइड है वहीं सेजल एक पंजाबी परिवार की लड़की है जिसका टूर के दौरान सगाई से की अंगूठी गुम हो जाती है। 
सेजल और हरि अंगूठी ढूंढते-ढूंढते करीब हा जाते है। फिल्म में दोनों की बीच ही नोकझोक से हास्य पैदा करने की कोशिश की है। गीतों को संगीत से सजाया है प्रीतम ने फिल्म में शाहरुख खान, अनुष्का शर्मा के अलावा एवलिन शर्मा, सयानी गुप्ता भी अहम किरदार में नजर आयेंगे।

       टॉयलेट- एक प्रेम कथा       
[11 Aug 2017-Toilet Ek Prem Katha]

11 अगस्त को रिलीज हो रही है 'टॉयलेट- एक प्रेम कथा'। यह फिल्म पूरी तरह से हास्ट बीट पर बनाई गई है जिसे शौचालय के लिए जनजागरण की मुहिम के तरह एक नये प्रयोग के रूप में देखा जा रहा है। या यू कहे कि बालीवूड पर भी प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान का प्रभाव पड़ रहा है।

फिल्म में अक्षय कुमार हास्य भूमिका में फिर एक बार दर्शकों के बीच आ रहे है। इससे पहले 'जॉली एलएलबी-2' में अक्षय को  इसी तरह की कॉमेडी करते देख चूके है। 'टॉयलेट- एक प्रेम कथा' में हास्य घर में शौचालयों की संदेश को लेकर पैदा की गई है। 
अक्षय की नई नवेली दुल्हन घर में शौचालय न होने से खफा हो जाती है और करती है यदि मुझे पहले ही पता होता तो शादी ही नहीं करती। फिर क्या है अक्षय की बीवी नाराज होकर मायके चली जाती है तब शुरू होता है शौचालय बनाने का प्रसंग।
फिल्म का निर्देशन किया है नारायण सिंह और निर्माता है अरुणा भाटिया, शीतल भाटिया। फिल्म की पटकथा और कहानी सिद्धार्थ गरिमा की है। अक्षय कुमार के अलावा इस फिल्म में भूमि पेडनेकर, अनुपम खेर और सना खान भी अहम भूमिका में नजर आयेंगे।

        हसीना        
[18 Aug 2017- Haseena]
18 अगस्त को 'हसीना' द क्वीन आॅफ मुंबई रिलीज हो रही है। यह फिल्म एक आपराधिक पृष्ठभूमि को लेकर बनाई गई है। जिसे निर्देशित किया है अगुवा लाखिया ने और निर्माता है नहिद खान। 

यह भी कहा जा रहा है फिल्म आतंकवादी दाऊद इब्राहिम की बहन हसीना पारकर पर आधारित है। जिसमें श्रद्धा कपूर हसीना पारकार और उनका सिद्धार्थ कपूर दाऊद इब्राहिम की भूमिका में हैं वही अंकुर भाटिया हसीना के पति की भूमिका में नजर आयेंगे।



         बरेली की बर्फी         
[18 Aug 2017- Bareilly Ki Barfi]

18 अगस्त को ही रिलीज हो रही है एक रोमांटिक कॉमेडी फिल्म 'बरेली की बर्फी'। फिल्म की महानी तीन युवाओ के इर्दगिर्द घुमती है। जिसमें आयुषमन खुराना एक प्रिंटिंग प्रेस मालिक हैं जबकि राजकुमार राव आयुषमान खुराना के लिये प्रेम में छपाई का काम कर रहे हैं।
कृति सानॉन फिल्म में महिला नेतृत्व की भूमिका निभा रही है, जो उत्तर प्रदेश की एक युवा समकालीन लड़की की भूमिका निभा रही है। 

फिल्म का निर्देशन किया है अशविनी अय्यर तिवारी ने और निर्माता है विनीत जैन, रेणु रवि चोपड़ा। 
फिल्म 'बरेली की बर्फी' में राजकुमार राव, आयुष्मान खुराना, कृति सानोन, पंकज त्रिपाठी अहम भूमिका में नजर आयेंगे।





        ए जेंटलमैन       
[25 Aug 2017-A Gentlemen]
25 अगस्त को रिलीज हो रही है 'ए जेंटलमैन'। यह एक एक्शन से भरपूर हास्य फिल्म है, जो राज और डीके. द्वारा लिखित और निर्देशित है।
सीता मेनन, सिद्धार्थ मल्होत्रा, जैकलिन फर्नांडीज, दर्शन कुमार और सुनील शेट्टी फिल्म में अहम किरदार में है।
फिल्म का ट्रेलर देखकर लगता है कि हास्य और रोमांश का तड़का इस फिल्म में देखने को मिलेगे। फिल्म के गाने और लोकेशन भी काफी अच्छा है पर जैकलिन अपने पुराने अंदाज में ही दर्शकों को लुभाने की कोशिश कर रही है 

अब यह तो आने वाला वक्त तय करेगा की फिल्म को लेकर किसने कितना काम किया हैै फिलहाल प्रदर्शन को अभी छोड़ा समय है।


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  • 4 अगस्त 2017 को प्रदर्शित हो रही है निर्माता गौरी खान की फिल्म 'जब हैरी मेट सेजल' मेंं शाहरूख खान और अनुष्का शर्मा है।
  • 11 अगस्त 2017 को प्रदर्शित हो रही है अरुणा-शीतल भाटिया की फिल्म 'टॉयलेट- एक प्रेम कथा' में अक्षय कुमार और भूमि पेडनेकर मुख्य भूमिका में नजर आयेंगे।
  • 18 अगस्त 2017 को प्रदर्शित हो रही है नाहिद खान की फिल्म 'हसीना पारकर' में श्रद्घा कपूर और सिद्धार्थ कपूर अहम किरदार में नजर आयेंगे।
  • 18 अगस्त 2017 को ही प्रदर्शित हो विनीत जैन और रेणु रवि चोपड़ा की फिल्म 'बरेली की बर्फी' में आयुष्मान खुराना, कृति सानोन मुख्य भूमिका में है।
  • 25 अगस्त 2017 को प्रदर्शित हो रही है राज और डीके. की फिल्म 'एक जेंटलमैन' में सिद्धार्थ मल्होत्रा, जैकलिन फर्नांडीज और सुनील शेट्टी अहम किरदार में है।



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Ref- All video YouTube and Photo screenshots in the official trailer


7.6.17

आखिर हिंसक क्यों हुये किसान?


मध्यप्रदेश के किसान विगत कई दिनों से अपने विभिन्न मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे थे कि अचानक ही छठवें दिन ऐसा क्या हो हुआ जो उन्होंने अपनी दिशा बदल ली। उग्र होकर हिंसा के रास्ते पर चल पड़े। जो सामने आया उस पर ही अपनी भड़ास निकालने लगे। जान-माल की क्षति पहुंचाने को आंदोलन का हिस्सा मानने लगे और पुलिस-प्रशासन ने भी उन्हे संभालने के बजाये अपनी कार्यवाही में गोली से जवाब देकर मामला और भी बिगाड़ दिये। किसान कर्ज माफी और फसलों के दाम बड़ाने जैसे मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे थे। मांग भी जायज है, किसानों को अपनी मेहनत का वाजिब दाम पाने का हक है। कहा जा रहा है कि मध्यप्रदेश के गांवों में पहले से ही पंचायत और जनपद स्तर पर किसान एकजुट होकर आंदोलन की रूपरेखा बना रहे थे। उनके साथ कई किसान नेता भी शामिल रहे जो राजनीति में भी अच्छी पैठ रखते है। जब किसानों के बीच इस तरह की रूपरेखा बनाई जा रही थी, जिसमें किसान नेता सरिक थे तो फिर उन्होंने शांति से बातचीत के द्वारा मामले को क्यों नहीं सुलझाया? 

किसानों के बीच सुलग रही आंदोलन की चिंगारी को बुझाने की सरकार ने भी कोशिश नहीं की। कहा तो यह भी जा रहा है कि प्रदेश के मंत्रियों को इस बात की जानकारी थी फिर भी वें ये बयान देते रहे कि उग्र आंदोलनकारी किसान नहीं बल्कि असमाजिक तत्व है तो हिसंक कृत्यों को अंजाम दे रहे है, किसान तो सरकार से बातचीत कर अपना आंदोलन समाप्त कर चुके है। यदि मंत्री जी इस तरह का बयान न देकर सीधे मुख्यमंत्री को इस बात से अवगत करते तो वाक्या कुछ और होता। ये नई पीढ़ी के किसान नेता है जो उग्र और हिंसक होकर आंदोलन को अंजाम दे रहे है जिसमें अंदर से कहीं न कहीं राजनैतिक हाथ होने से इंकार नहीं किया जा सकता।

पश्चिमी मध्यप्रदेश में मंदसौर के किसानों ने जिस तरह की हरकत किये रेल रोकना, पटरियां उखाड़ना, मारपीट करना, गांड़ियों में आग लगाना आदि काम लगता नहीं कि ये किसानों का है। परिश्रम और सेवा धर्म से अभिभूत धरती पुत्रों के अंदर ये हिंसा का भाव समाज ने ही ठूसे है। प्रशासन ने घोर लापरवाही बरतते हुये उग्र किसानों पर गोली चलवाए, हिंसा के राह पर भटके किसानों को प्रशासन ने भी हिंसा से ही जवाब देकर आंदोलन के अंजाम को मरने मारने तक पहुंचा दिये। किसानों ने अपनी आवाज बुलंद करने के लिये हिंसक बने तो प्रशासन उनकी मुंह दबाने के लिये हिंसक हुये। मंदसौर सहित मध्यप्रदेश के कई जिलों में कर्फ्य लगा दिया गया है। 6 किसानों की मौत और कितनों के जख्मी होने के बाद मध्यप्रदेश का हालात और भी बिगड़ सकता है जब राजनेता अपने-अपने राजनैतिक रोटी सेकने किसान आंदोलन पर बयान बाजी करेंगे। स्पष्ट रूप से कहा जाये तो शासन-प्रशासन की नाकामी और लापरवाही साफ दिखाई दे रहा है। आंदोलनकारियों के हिंसक होने के जिम्मेदार भी कुछ हद स्थानीय जनप्रतिनिधी है। समय पर किसानों की मांगों पर यदि शासन ने सकारात्मक पहल की होती तो किसान आंदोलन समाप्त हो गया होता।

हिंसा के बाद मध्यप्रदेश का हालात कश्मीर और गुजरात सा हो गया है, प्रशासन ले कर्फ्य और धारा 144 लगा दी है, इंटरनेट सेवा पूरी तरह बंद है। किन्तु राजनैतिक बयान-बाजी पर कोई लगाम नहीं लग पा रहा है। प्रदेश सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल कर प्रमुख विपक्षी दल के नेता घटना स्थल पर मरहम के बजाये आग में घी डालने में लगे है। किसानों के आंदोलन को सही और जायज बताने वाले नेताओं को हिंसक घटना और मौत का खूनी खेल छोड़कर किसान हित में मामलें को शांतिपूर्वक सुलझाने का प्रयास किया जाना चाहिए। 
पीड़ितों को अपना हक मांगने का पूरा अधिकार है पर ये तरीका उचित नहीं है। उनकी हरकते देखकर लगता नहीं कि ये वही किसान है जो दिन-रात खेतों में मेहनत कर अनाज पैदा कर दुनिया का भरन-पोषण करते है। असमाजिक तत्वों की भांति रेल की पटरियां उखाड़ना, किसी की वाहन को आग लगा देना, चक्का जाम करना, मरने-मारने पर आतुर होना। इस तरह के व्यवहार से शासन-प्रशासन से ज्यादा तो आम लोगों को नुकसान हो रहा है। सड़क और रेल मार्ग अवरूध होने से आम जन-जीवन बुरी तरह प्रभावित होता है न की शासन-प्रशासन की कमर टुटती है। एक तरह से कहा जाये तो मंदसौर का किसान आंदोलन अपने ही हाथों अपना हाथ जलाने वाला रहा है जिसमें नेता और अफसर तमास देखने वाले रहे।

घटना के बाद ज्यादा तनावग्रस्त इलाकों में कर्फ्यू और अन्य क्षेत्रों में धारा 144 लागू हुई और मौत पर सरकारी मरहम लगाई गई जिसमें मृतक के परिवार के किसी एक सदस्य को योग्यता अनुसार सरकारी नौकरी और एक करोड़ का सहायता राशी। घायलों को सरकारी ईलाज के साथ 5-5 हजार रूपये आर्थिक मदद देना का घोषणा मुख्यमंत्री की ओर से हुई है। न्यायिक जांच के आदेश दे दिये गये है। बहरहाल सरकार का न्यायिक जांच जो भी कहे पर किसान आंदोलन को हिंसक बनाने में पक्ष-विपक्ष दोनों के किसान नेताओं का ही हाथ है, बेचारे किसान तो बलि का बकरा बने है। भीड़ को उकसाने के बाद घटना स्थल से गायब हुये नेता खुले आम टीवी चैनलों में दोषारोपण का धारावाहिक बना रहे हैं, ऐसे नेताओं पर कार्यवाही हो किसानों को अपना जायज हम मिले। प्रशासन भी आंदोलन को हल्के में लेने की भूल सुधारते हुये, प्रदेश के किसानों के बजाये उन्हे हिंसक बनाने वाले नेताओं पर नकेल कसे। आम किसानों को बाहरी नेताओं को दूर रखा जाये। हालात का जायजा लेने के नाम पर बाहरी नेता को घटना स्थल पर जाने से रोका जाये क्योकि उनका बेतुका बयान हालात को और बिगाड़ने का काम करेगा।
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