7.6.17

आखिर हिंसक क्यों हुये किसान?


मध्यप्रदेश के किसान विगत कई दिनों से अपने विभिन्न मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे थे कि अचानक ही छठवें दिन ऐसा क्या हो हुआ जो उन्होंने अपनी दिशा बदल ली। उग्र होकर हिंसा के रास्ते पर चल पड़े। जो सामने आया उस पर ही अपनी भड़ास निकालने लगे। जान-माल की क्षति पहुंचाने को आंदोलन का हिस्सा मानने लगे और पुलिस-प्रशासन ने भी उन्हे संभालने के बजाये अपनी कार्यवाही में गोली से जवाब देकर मामला और भी बिगाड़ दिये। किसान कर्ज माफी और फसलों के दाम बड़ाने जैसे मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे थे। मांग भी जायज है, किसानों को अपनी मेहनत का वाजिब दाम पाने का हक है। कहा जा रहा है कि मध्यप्रदेश के गांवों में पहले से ही पंचायत और जनपद स्तर पर किसान एकजुट होकर आंदोलन की रूपरेखा बना रहे थे। उनके साथ कई किसान नेता भी शामिल रहे जो राजनीति में भी अच्छी पैठ रखते है। जब किसानों के बीच इस तरह की रूपरेखा बनाई जा रही थी, जिसमें किसान नेता सरिक थे तो फिर उन्होंने शांति से बातचीत के द्वारा मामले को क्यों नहीं सुलझाया? 

किसानों के बीच सुलग रही आंदोलन की चिंगारी को बुझाने की सरकार ने भी कोशिश नहीं की। कहा तो यह भी जा रहा है कि प्रदेश के मंत्रियों को इस बात की जानकारी थी फिर भी वें ये बयान देते रहे कि उग्र आंदोलनकारी किसान नहीं बल्कि असमाजिक तत्व है तो हिसंक कृत्यों को अंजाम दे रहे है, किसान तो सरकार से बातचीत कर अपना आंदोलन समाप्त कर चुके है। यदि मंत्री जी इस तरह का बयान न देकर सीधे मुख्यमंत्री को इस बात से अवगत करते तो वाक्या कुछ और होता। ये नई पीढ़ी के किसान नेता है जो उग्र और हिंसक होकर आंदोलन को अंजाम दे रहे है जिसमें अंदर से कहीं न कहीं राजनैतिक हाथ होने से इंकार नहीं किया जा सकता।

पश्चिमी मध्यप्रदेश में मंदसौर के किसानों ने जिस तरह की हरकत किये रेल रोकना, पटरियां उखाड़ना, मारपीट करना, गांड़ियों में आग लगाना आदि काम लगता नहीं कि ये किसानों का है। परिश्रम और सेवा धर्म से अभिभूत धरती पुत्रों के अंदर ये हिंसा का भाव समाज ने ही ठूसे है। प्रशासन ने घोर लापरवाही बरतते हुये उग्र किसानों पर गोली चलवाए, हिंसा के राह पर भटके किसानों को प्रशासन ने भी हिंसा से ही जवाब देकर आंदोलन के अंजाम को मरने मारने तक पहुंचा दिये। किसानों ने अपनी आवाज बुलंद करने के लिये हिंसक बने तो प्रशासन उनकी मुंह दबाने के लिये हिंसक हुये। मंदसौर सहित मध्यप्रदेश के कई जिलों में कर्फ्य लगा दिया गया है। 6 किसानों की मौत और कितनों के जख्मी होने के बाद मध्यप्रदेश का हालात और भी बिगड़ सकता है जब राजनेता अपने-अपने राजनैतिक रोटी सेकने किसान आंदोलन पर बयान बाजी करेंगे। स्पष्ट रूप से कहा जाये तो शासन-प्रशासन की नाकामी और लापरवाही साफ दिखाई दे रहा है। आंदोलनकारियों के हिंसक होने के जिम्मेदार भी कुछ हद स्थानीय जनप्रतिनिधी है। समय पर किसानों की मांगों पर यदि शासन ने सकारात्मक पहल की होती तो किसान आंदोलन समाप्त हो गया होता।

हिंसा के बाद मध्यप्रदेश का हालात कश्मीर और गुजरात सा हो गया है, प्रशासन ले कर्फ्य और धारा 144 लगा दी है, इंटरनेट सेवा पूरी तरह बंद है। किन्तु राजनैतिक बयान-बाजी पर कोई लगाम नहीं लग पा रहा है। प्रदेश सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल कर प्रमुख विपक्षी दल के नेता घटना स्थल पर मरहम के बजाये आग में घी डालने में लगे है। किसानों के आंदोलन को सही और जायज बताने वाले नेताओं को हिंसक घटना और मौत का खूनी खेल छोड़कर किसान हित में मामलें को शांतिपूर्वक सुलझाने का प्रयास किया जाना चाहिए। 
पीड़ितों को अपना हक मांगने का पूरा अधिकार है पर ये तरीका उचित नहीं है। उनकी हरकते देखकर लगता नहीं कि ये वही किसान है जो दिन-रात खेतों में मेहनत कर अनाज पैदा कर दुनिया का भरन-पोषण करते है। असमाजिक तत्वों की भांति रेल की पटरियां उखाड़ना, किसी की वाहन को आग लगा देना, चक्का जाम करना, मरने-मारने पर आतुर होना। इस तरह के व्यवहार से शासन-प्रशासन से ज्यादा तो आम लोगों को नुकसान हो रहा है। सड़क और रेल मार्ग अवरूध होने से आम जन-जीवन बुरी तरह प्रभावित होता है न की शासन-प्रशासन की कमर टुटती है। एक तरह से कहा जाये तो मंदसौर का किसान आंदोलन अपने ही हाथों अपना हाथ जलाने वाला रहा है जिसमें नेता और अफसर तमास देखने वाले रहे।

घटना के बाद ज्यादा तनावग्रस्त इलाकों में कर्फ्यू और अन्य क्षेत्रों में धारा 144 लागू हुई और मौत पर सरकारी मरहम लगाई गई जिसमें मृतक के परिवार के किसी एक सदस्य को योग्यता अनुसार सरकारी नौकरी और एक करोड़ का सहायता राशी। घायलों को सरकारी ईलाज के साथ 5-5 हजार रूपये आर्थिक मदद देना का घोषणा मुख्यमंत्री की ओर से हुई है। न्यायिक जांच के आदेश दे दिये गये है। बहरहाल सरकार का न्यायिक जांच जो भी कहे पर किसान आंदोलन को हिंसक बनाने में पक्ष-विपक्ष दोनों के किसान नेताओं का ही हाथ है, बेचारे किसान तो बलि का बकरा बने है। भीड़ को उकसाने के बाद घटना स्थल से गायब हुये नेता खुले आम टीवी चैनलों में दोषारोपण का धारावाहिक बना रहे हैं, ऐसे नेताओं पर कार्यवाही हो किसानों को अपना जायज हम मिले। प्रशासन भी आंदोलन को हल्के में लेने की भूल सुधारते हुये, प्रदेश के किसानों के बजाये उन्हे हिंसक बनाने वाले नेताओं पर नकेल कसे। आम किसानों को बाहरी नेताओं को दूर रखा जाये। हालात का जायजा लेने के नाम पर बाहरी नेता को घटना स्थल पर जाने से रोका जाये क्योकि उनका बेतुका बयान हालात को और बिगाड़ने का काम करेगा।
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