31.12.16

कड़ाके की सर्दी में भी मस्ती का पारा गरम




सताये, रोम-रोम ठिठुराते कड़ाके की सर्दी खूब
सुहाये, रात में अलाव और सबुह की गुनगुनी धूप
सुहाने, ऊनी कपड़ों के भीतर से लेलो मजा जनाब
सुलगते, सिगड़ी में उफनते चाय और गरमा-गरम सूप

कोहरों के गिरफ्त में आ सूरज
दिशा चिनहात न कोन है पूरब
दोपहर ही जानौ अब सबेरा
दिन ढल जात सबही अकारज


नल की टोंटी से झरता ओला
पोखरों ने बदला अपना चोला
पानी की न पूछ अब स्वरूप
वों पल में मासा, पल में तोला


समयचक्र का सुई धीरे-धीरे जाड़े की ओर जा रहा है। कहीं घनघोर कोहरा तो कहीं शीतलहर का आलम, लोगों को घरों में दुबकने को मजबूर कर दे रहा है। आलमारी से स्वेटर, मफलर और रजाई निकल चुके है। फ्रिजर की जगह गिजर आ गया। मेकअप बाक्स में भी गोल्ड क्रीम ने कब्जा जमा लिया है। लोग अपने-अपने तरीके से सभी बाकी ऋतुओं की तरह शीत का सामने करने को तैयार है। सुबह-सुबह घर पर आने वाले अखबारों को ज्यादा तवज्जों देने की जरूरत नहीं वर्ना ऋतुओं का आनंद नहीं ले पायेंगे। और ऋतुएं भी अपना पूर्ण प्रकोप दिखाये बगैर ही लौट जायेगी। दिल खोल कर शानदार तरीके से शीतकाल का स्वागत करने से वो भी हमें सेहत और तंदूरस्ती से भरपूर चार महीना देके जायेंगे। ठंड और रूखी त्वचा की चिंता छोड़कर सैर सपाटे के मूड में आइये। क्रिसमस डे, स्कूल में शीतकालीन छुट्टी और नव वर्ष का आगाज है ही सोने पे सुहागा ऑफर। अभयारण्य, पार्क, जूं, बाग-बगीचे, ताल-तलैया आदि आपके स्वागत को आतुर बाहे फैलाये खड़े है, तो चलिये प्रकृति के करीब इस कड़ाके की सर्दी में भी मस्ती का पारा गरम करें।


पर्यटन पाइंट-




जो विभिन्न पर्यटक स्थलों का आनंद नहीं ले पाये वे बहानों के पहाड़ बनाने से बाज नहीं आते। कुछ प्राकृतिक आपदाओं और हादसों के डर से बाहर न जा पाया, काम के वयस्तता से समय ही नहीं निकला, बस या ट्रेन का टिकट कंफर्म नहीं हो पाया, माली हालत ठीक नहीं है, परिवारिक उलझनों में फसा रहा इत्यादि कारणों के दरार पर क्रेक क्रीम लगाए और कड़ाके की सर्दी में लजीज व्यंजनों का लुफ्त उठाये। मन में किसी बात का मलाल नहीं होना चाहिए कि हम इस मौसम में कुछ नहीं कर पाये। मौसम के ऊपर दोष भी न मड़े। जीवन में बरसात, सर्दी, बहार और गरमी बूरे योग से नहीं मिलते बहरहाल से भी कुदरत की देन है। तन और मन को मौसम के अनुकूल ढालने में ही जीवन का असली आनंद है। फिरहाल आपके सेहत के लिये शीत ऋतु में परोसे जाने वाले थाली आ आनंद लीजिए।

लजीज व्यंजन

गर सौर-सपाटे और लजीज व्यंजनों से भी जी न भरे तो सड़क किनारे खुले आसमान के नीचे ठिठुरते गरीब दीन-हीन लोगों को जी भरके निहारें। अनके पास मौसम की मार सहने के लिये क्या-क्या संसाधन इसकी भी एक सूची बनाये। काम की तलास में घर-द्वार छोड़ कर दूर देश में पलायन कर आये किसी गांव के बेरोजगार युवा को रेल्वे स्टेशन के बेंच में आराम से सोते देखें। फूटपाथ के डस्टबीन में से प्लास्टि की थैली और कचरे से आग चलाकर हाथ सेंकते हमाल और रिक्शचालक। किसी दुकान के बरामदे में सोये कोई मंदबुद्धि इंसान, भिख मांगने वाले गरीब, घर से निकाले गये बुजूर्ग जनों के अंग के कपड़ों को देखें। यदि इतना सब कुछ देखने के बाद यदि कड़ाके की काली रात में भी आपके तन-मन में आग न लगे, आपका जिया न धड़के, आंखे खुली न रह जाये तब तो वाकई ये मौसम क्रूर है। अब और आगे कुछ देखने की जरूरत नहीं सिर्फ अपने आपको हर परिस्थिति से जूझना सिखाये। हर ऋतु आपके अनुकूल होकर आनंद भर देगी जीवन में। 
खुले आसमां तले गुजार दी जिंदगी, कुछ बिरादरी वाले।
हम महलों के भीतर से कोसते रहे, सुख से जीने वाले।।

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