20.11.13

आस्था और विश्वास कि ऐसी की तैसी: रामलीला

RAMLILA


फिल्म देखने जाने से पहले अब तो फिल्म का प्रोमो और पोस्टर देखकर जाने में ही समझदारी है। टॉकीज जाकर ठगा महशुस करने से अच्छा तो अखबारों और पत्रिकाओं में अच्छी तरह पड़ताल करने के बाद ही टिकट की लाइन में लगे वरना होता कुछ है दिखाते कुछ और है।
राम-लीला संजयलीला भंसाली कि फिल्म रामलीला को प्रदर्शित होने से रोकने के दायर लिए याचिका पर सुनवाई न होने कारण। और तताम विरोधों के अब फिल्म अंतत: प्रदर्शित हो ही रहा है। फिल्म का नाम सुनने से ऐसा लगाता है कि यह फिल्म एक धार्मिक और भक्ति-रसमय होगा। किन्तु हकीकत कुछ और है इसमें धर्म और भक्ति का दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। ये पहली बार नहीं हुआ है जब इस तरह से लोगों कि धार्मिक भावनाओं के साथ कई बार खिलवाड़ हुआ। फिल्म मेकर से लेकर नामी कलाकार भी नामों के आड़ में धंधा करते है। उनके लिए लोगों की भावना और विश्वास कोई माइने नहीं रखता है उन्हे तो बस किसी न किसी बहाने दर्शकों को सिनेमाघरों आकर्षित करना है। फिल्म के नाम के साथ ही गानों में भी देवी-देवताओं और महापुरूषों की महिमा का भरपूर उपयोग किया जाता है। इतने सारे विद्वान और सुलझे हुए व्यक्तियों द्वारा इस तरह से करतुत करना नादानी नहीं बल्कि सोची समझी गुस्ताखी है। गुस्ताखी की सजा तो मिलनी चाहिए, सिर्फ प्रदर्शन में रोक लगाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। कुछ ऐसा फैसला निकलकर सामने आए कि लोग इस तरह नामों का उपयोग करने की हिम्मत न करें।
स्टार कॉस्ट फिल्म रामलीला में रणवीर और दीपिका की जोड़ी को लोग तो देखने के लिए टॉकीज तक आते इससे पहले ही रामलीला से पर्दा उठ गया। राम और लीला कि प्रेम कहानी को रामलीला फिल्म का नाम देने से भले संजयलीला भंसाली को कोई फर्क नहीं पड़ता पर जो लोग राम नाम पर भरोसा करते है उन्हे तकलीफ हो रही है। धर्म और आस्था के भारत भूमि में भी भगवान पैसा कमाने का माध्यम बन चुका है। फिल्म सेंशर बोर्ड के होते हुए भी इस तरह के फिल्म सिनेमाघरों तक आते है। उंगली तो सेंसर बोर्ड पर भी उठनी चाहिए। आखिर वे ऐसे नामों को परमिट करते ही क्यों है जो विवादित हो, जो संप्रदायिक हो। फिल्म जनता को जगाने के लिए, लोगों तक संदेश पहुंचाने का एक अच्छा माध्यम है किन्तु अगर उस माध्यम का उपयोग लोग अपने-अपने तरीके से करने लगे है। निज स्वार्थ के लिए कुछ भी परोसा जा रहा है। प्रतियोगिता और माया नगरी के चकाचौंध से दर्शकों के साथ-साथ कलाकार भी अभिनय नहीं सिर्फ आदा और लगटके झटके के आड़ में लाखों दिलों में अपनी जगह पाने कि चाहत से कुछ भी करने को आतुर है। हो भी क्यो न मयानगरी में जो दिखता है वो बिकता है। जनाब जो दिखता है वो बिकता है तो माल भी चोखा रखो, कवर में कुछ और अंदर माल कुछ और, ये तो गलत है।---------जयंत साहू, डूण्डा, रायपुर छ.ग./ 07746053304

6.11.13

अंधभक्तों को अरोप पत्र में भी साजिश

सादे पोषाक में रहने वाले संत के रंगीन मिजाजी से आज दुनिया वाकिफ हो चुकी है एक संत के कारण पूरे संत बिरादरी पर अविश्वास करना उचित नहीं है, इस घटना ने लोगों के भावनाओं को चोट जरूर पहुंचा है। कहीं न कहीं उनके मन में हर गेंहुवा वस्त्र के लिए अब नजरे टेढ़ी जरूर हुई है...    
दुनिया को उपदेश देने वाले आसाराम ने अपने आस-पास अंधभक्तों की इतनी फौज तैयार कर रखी है कि वे तो अरोप पत्र को साजिश बता रहे है। संत होकर अब कौन गुंडागर्दी कर रहा है ये साफ हो गया। पहले तो यह कहा जा रहा था कि आरोप ही बेबुनियाद है। अब पुलिस के द्वारा आरोप पत्र दाखिल करने बाद भी उनके भक्त बापू-बापू के नाम की माला जप रहे है। न जाने उनके बापू ने क्या घुट्टी पिलाई है, उन पर लगा हर आरोप एक साजिश लग रही है।
    आसाराम के उपर आश्रम के लिए जमीन अधिग्रहण से लेकर बच्चों की बलि और बलात्कार जैसे संगिन आरोप भी लगे है जो परत दर परत आइने की तरह साफ होता जा रहा है। आसाराम की हकीकत आज लोगों के सामने है। एक संत जो धर्म और गुरू की महानता को कलंगित कर चुका है, एक आम आदमी को तो उसे संत कहने में भी शर्म आ रही है किन्तु उनके भक्तों की आखें कब खुलेगी, वे ही जाने। एक संत होकर आरोपों का सामने करने के बजाए कानून से भागे और पकड़ के बाद अपने गुंडों के द्वारा पुलिस और मीडिया कर्मीयों पर दबांगाई दिखाये। ये किस बिरादरी के संत है, हर शहर में आलिशन कुटिया और सौकड़ों एकड़ का आश्रम वह भी बेजा कब्जा।
    पाप का घड़ा फुटने के बाद एक के बाद एक काले कारनामों से पर्दा उठता जा रहा है। राजस्थान पुलिस द्वारा जो आरोप पत्र दाखिल किया गया है उससे तो यही अंदेशा है कि अब आसाराम ताउम्र सलाखों के पीछे ही रहेंगे। नाबालिक से यौन शोषण के आरोप में पुलिस के हत्थे चढ़े आसाराम और उनके चार साहयोगियों के खिलाफ जोधपुर कोर्ट में 1012 पन्नों की चार्जशीट दाखिल कर दी है। आरोप पत्र में आसाराम पर बलात्कार, यौन उत्पीड़न, बंधक बनाना, धमकी देना समेत जेजे और पॉस्को ऐक्ट के तहत कई सख्त धाराएं लगाई गई हैं। अगर ये आरोप साबित हो जाते हैं तो उन्हें 10 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है। यह भी कहा गया है कि राजस्थान पुलिस ने करीब 140 गवाहों से पूछताछ की है और उनके बयानों के आधार पर यह आरोप पत्र तैयार कर बुधवार उसे जोधपुर कोर्ट में पेश किया गया। दुनिया में सत का संदेश देने वाले संत ने हालांकि कोर्ट में अपना जुर्म कबूला नहीं है।
    इतने आरोप लगने के बाद भी अपने को बेदाग बताने वाले संत के उपर धारा 376 (2): बलात्कार, जिसके तहत 10 साल से उम्रकैद तक की सजा। धारा 370: बंधक बनाना, 7 साल तक की सजा। धारा 506: धमकाना, 7 साल तक की सजा और जुर्माना। 26 जेजे ऐक्ट: नाबालिग का शोषण, 3 साल तक की सजा। 5/6 पॉस्को ऐक्ट: 10 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है। ऐसा भी नहीं है कि आसाराम के भक्तों में सभी अनपढ़ है। कई कानून के जानकार है और वही लोग उनके झुठ को सच्च और पीड़िता को झूठा ऐसा भी नहीं है कि आसाराम के भक्तों में सभी अनपढ़ है कई कानून के जानकार है, वही लोग तो उनके झुठ को सच्च और पीड़िता को झूठी साबित करने में आमद है। उनकी माने तो जो भी व्यक्ति उन पर आरोप लगा रहे है या उनके खिलाफ गवाही दे रहे है वो सभी आश्रम ले निकाले गये लोग है। आखिर संत के दरबार से लोग क्यों निकाले जाते है। दुनिया को सात्विक जीवन की सलाह और दीक्षा देने वाला खुद सारे सुखों का भोग करे और चेले बेचारे उनकी बातों में आकर अपने सुखों के साथ-साथ घर परिवार का त्याग कर उनके शरण में चले जाते है। कई उनके भक्तो ं को तो यह भी पता नहीं था की आसाराम (बाल-बच्चे)परिवार वाला आदमी है। सादे पोषाक में रहने वाले संत के रंगीन मिजाजी से आज दुनिया वाकिफ हो चुकी है। एक संत के कारण पूरे संत बिरादरी पर अविश्वास करना उचित नहीं है। इस घटना ने लोगों के भावनाओं को चोट जरूर पहुंचा है। कहीं न कहीं उनके मन में हर गेंहुवा वस्त्र के लिए अब नजरे टेढ़ी जरूर हुई है। साधुसंतों पर आस्था जरूर हो, बिन गुरू के ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती। किन्तु ऐसे संतों से सीख लेने की जरूरत हम सब को है अब बंद आखों से ईश्वर का नाम जपने के बजाए अब आखें खोल कर भगवान का दीदार करने में ही सबकी भलाई।

4.11.13

मंत्रियों की सम्पत्ति ब्योरें में कितनी सचाई!

चुनाव के दौरान नामांकन दाखिल करते वक्त चुनाव आयोग के सामने प्रत्याशी अपनी-अपनी संपत्ति का ब्योरा देते हैं। कोई करोड़पति तो कोई लखपति और कई अरबपति होकर भी हजारी है, शपथपत्र के अनुसार। जो पहिली बार भाग्य आजमा रहे उनकी संपत्ति में हेरफेर तो समझ आता है पर जो जीत का स्वाद चख चुके है और विगत कई सालों तक मंत्री पद पर सुशोभित रहे है उनकी भी संपत्ति ज्यों कि त्यों है!

              क्या वे अपने कार्यकाल में कुछ भी जमा पूंजी नहीं बना पाये है? ऐसा तो संभव ही नहीं है। कालेधन और काली कमाई की बाते छोड़कर भी हम ऑकलन लगाये तो भी पांच साल में दूगुना हो सकता है लेकिन मंत्री महोदय तो दस साल तक मालदार पद में रहने के बाद भी कुछ धन जमा नहीं होने की बात अपने शपथपत्र में कर चुके है। अगर उन तथ्यों में वास्तविक्ता है तो मंत्री महोदय देश के लिए अनुशर्णीय है, और यदि सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं होने की बात कर रहे है तो जनता अंधी और बहरी नहीं है। जनता सब देख और सुन रही है किन्तु चुनाव आयोग को देखना और समझना होगा की मात्र शपथपत्र में हस्ताक्षर करके अपनी संपत्ति का ब्योरा दे रहै है उनमें कितनी सच्चाई। दिये गये संपत्तियों के ब्योरंे को देखा जाए तो हकीकत कुछ और ही होती है। एक तरफ तो सरकार परिवार में पति-पत्नि, मां-बाप , बेटा-बेटी इनको भी परिवार का हिस्सा मानती है। वहीं दूसरी तरफ नामांकन दाखिले में प्रत्याशी केवल अपने ही नाम के संपत्ति का ब्योरा प्रस्तुत करता है।
    क्या पद में रहते हुए वे अपनों को लाभ नहीं पहुंचाया होगा, अपने रिस्तेदारों के नाम पर या अन्य किसी के नाम पर कोई कितनों ही धन जमा कर सकता है? वर्तमान में एक मंत्री ने अपने शपथ में लिखा है उनके पास कोई वाहन ही नहीं। गौर करने वाली बात है हर वक्त एयर कंडिशन में रहने वाले, हाईप्रोफाईल सोसाइटी के घर पर कैसे कोई वाहन नहीं है? यदि उनकी वास्तविक कमाई को देखा को जाए तो पांच साल में वे एक पाई भी अपने जेब से खर्च नहीं करते है सारा सामान तो शासन उपलब्ध करता है। घरेलु सामान से लेकर वाहन और फोन का बिल भी मुफ्त का। ऐसे में उनका पगार तो पूरा जमा हो जाता है, भत्ता और उपरी कमाई सो अलग। अब नामांकन के समय में यदि वे कुछ छिपाते है तो साफ तौर पर लोगों को बेवकुफ बनाने वाला काम है। इस ओर चुनाव आयोग को विशेष रूप से नियमों में कड़ाई करनी होगी। प्रत्याशियों की संपत्ति का ब्योरा प्रस्तुत करने के उपरांत उस शपथपत्र के संपत्ति और अन्य जानकारी की बारिकी से परीक्षण होना चाहिए, असत्य पाये जाने पर दंड का भी प्रावधान हो।

30.10.13

jayant sahu


सभी मित्रों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं.......
Jayant sahu [ Raipur chhattisgarh]

23.1.13

National Voters Day : मतदाता बनने पर गर्व है

भारत में मतदाताओं को और अधिक जागरुक बनाने और उन्हें मतदान करने के लिए प्रोत्साहित करने के मकसद के साथ मतदाता दिवस की शुरुआत की गई है। भारत में आज भी ग्रामीण इलाकों में लोग मतदान करने के लिए घरों से बाहर नहीं आते हैं। इसी कारण कई क्षेत्रों से ऐसे नेता चुनकर आते है जो देश और समाज विकास कराने के बजाए स्वयं के विकास की नीति से काम करते है। जहां से आम लोग मतदान करने बाहर नहीं आते वहां के जनप्रतिनिधी अपने खरीदे हुए वोटरों के भरोसे विधानसभा या लोकसभा तक पहुंचे है। जनता यदि सही जनप्रतिनिधी चाहती है तो उनको अपने घरों बाहर आकर मतदान के महत्व को समझना होगा। आज भी लोगों की मानसिकता यह है कि मेरे वोट न देने से क्या होगा। जबकि ऐसा नहीं है हर एक वोट की किमत है। ऐसी भी मनोभाव हो जाती है कि हम तो किसी पार्टी से नहीं है या हमने तो किसी से कुछ लिया, नहीं जो लिये है वो जाकर अपना फर्ज निभाये। यह जरूरी नहीं कि आप किसी पार्टी से संबंध रखते हो आप मत आपके स्यमं के विवेक पर निर्भर करता है कि आप किसे देने चाहते है। बात लेने देने की भी नहीं, बात है देश और समाज का है। इसीलिए अपन मतों के महत्व हो समझना होगा। क्योंकि आपका एक वोट किसी की जिंदगी बदल सकती है। हर भारतवासी को जो अठारह साल उम्र पूरी कर चुके है मतदाता सूची में नाम दर्ज कराए और देश व समाज के हित में अपना नेता चुनने में मतों का प्रयोग जरूर करे।
मतदान का अधिकार- अठारह साल उम्र पूरी कर चुके हर भारतीय नागरिक को मतदान करने का अधिकार है। (अगर उसे की सक्षम न्यायालय ने पागल नहीं घोषित किया है या फिर भ्रष्टाचार तथा चुनाव से संबद्ध किसी अपराध के लिए किसी कानून के अंतर्गत उसे मतदान के अयोग्य घोषित नहीं किया गया है) गौरतलब है कि 1988 में संविधान (61वां संशोधन) अधिनियम द्वारा मतदान की उम्र 21 वर्ष से 18 वर्ष की गयी थी।
मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने की प्रक्रिया-
1. केवल मतदाता कार्डों में शामिल लोगों के नाम ही नई मतदाता सूची में लिए जाते हैं ।
2. निर्वाचन आयोग के द्वारा किसी क्षेत्र की मतदाता सूचियों में संशोधन का आदेश दिए जाते ही, मतदाताओं की गणना करने वाले सरकारी कर्मचारी क्षेत्र के हर घर में जाते हैं ।
3. कर्मचारी घर के मुखिया और उसकी अनुपस्थिति में परिवार के किसी वरिष्ठ सदस्य उन सदस्यों के नाम तथा अन्य विवरण लेते हैं जो मतदाता सूची में शामिल किए जाने की पात्रता रखते हैं ।
4. गणना करने वाले कर्मचारी इन सदस्यों की उम्र तथा आवास के प्रमाण पत्र, जन्म प्रमाण पत्र , पासपोर्ट आदि मांग सकते हैं।
5. इन ब्योरों से संतुष्ट होने के बाद कर्मचारी मतदाता कार्ड पर इन नामों और ब्योरों को दर्ज करता है और कार्ड पर कोड नंबर डलता है ।
6. कर्मचारी मतदाता कार्ड की प्रति घर के मुखिया को देता है जिसे भविष्य में संदर्भ के लिए संभालकर रखना चाहिए। मतदाता कार्ड के आधार पर मतदाता सूची में नाम दर्ज किया जाता है ।
8. मतदाता कार्ड में सामान्य रुप से रहने वालों के नाम ही दर्ज किए जाते हैं, लेकिन पढ़ाई के लिए बाहर रहने वाले और छुट्टियों में घर आने वाले वयस्क हो चुके बच्चों के नाम भी उनके माता-पिता के पते के साथ मतदाता कार्ड में दर्ज कर लिए जाते हैं ।
9. अगर सरकारी कर्मचारी के बार-बार जाने पर भी घर का मुखिया अथवा कोई वरिष्ठ व्यक्ति नहीं मिलता है तो कर्मचारी घर में एक फॉर्म छोड़ा जाता है । यह फॉर्म भरकर कर्मचारी के अगली बार आने पर उसे दे देना चाहिए। यह फॉर्म भरकर चुनाव क्षेत्र के चुनाव पंजीकरण अधिकारी अथवा क्षेत्र के मुख्य चुनाव अधिकारी के पास सीधे भी भेजा जा सकता है।
मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण बातें-
1. कोई व्यक्ति एक से ज्यादा चुनाव क्षेत्रों में मतदाता के रुप में पंजीकृत नहीं हो सकता है ।
2. कोई व्यक्ति एक ही चुनाव क्षेत्र के एक से ज्यादा हिस्सों में मतदाता नहीं हो सकता है ।
3. मतदाता कार्ड पर गलत जानकारी देने वाले व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है ।
5. जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के अंतर्गत गलत जानकारी देने के अपराध में एक साल की कैद या जुर्माना  या दोनों सजाएं हो सकती हैं। 
मत दान अथवा मत नीलाम - भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में देश की जनता द्वारा चुनकर आये जनप्रतिनिधी जिस तरह से घोटालों और रिश्वतखोरी में संलिप्त होकर जनता की मतों का अपमान कर रहे है इससे एक वर्ग खासे निराश है। यह बात भी सामने आती है कि हमरे द्वारा हमरे लिए चुने गये नेता चुनाव जितने के बाद पार्टी का हो जाता है। जो नेता जिस दल को होता है वह अपने ही पार्टी कार्यकर्ताओं पर विशेष कृपा बरसाते है। आम जनता की समस्यों से उनको काई सरोकार नहीं होती है। उनके लिए पार्टी और कार्यकर्ता से बढ़कर कोई नहीं। अब तो नेता इसी जुगाड़ में रहते है कि कहा से कैस वोट खरीदे जाए। चाहे जो हो जाए जितनी भी रूपये या समान लगे लूटाओं और वोटरों को लुभावो। ऐसे नेताओं के लिए हुए मतदान को मत नीलाम कहे तो अतिशंयोक्ति नहीं होगी। मतदाताओं के मनोभाव को समझते हुए निवाचन आयोग को इस विषय में गंभीरता चिंतन कर कुछ संवैधानिक रास्ता निकालना चाहिए। ताकि जनता को मत दान करने के बाद अफसोस न हो।
25 जनवरी  राष्ट्रीय मतदाता दिवस : बने जागरूक मतदाता
मतदान केंद्रों से संबंधित शिकायतें-
1. समस्याओं के बारे में जिला चुनाव अधिकारी या निर्वाचन अधिकारी या मुख्य चुनाव अधिकारी या निर्वाचन आयोग से शिकायत करें। 2. मतदान केंद्र के पीठासीन अधिकारी से आग्रह करें कि आपकी राय अपनी डायरी में दर्ज करें।
मतदान केंद्रों और चुनाव प्रचार में गड़बड़ियां-
1. अगर मतदाताओं या उम्मीदवारों के एजेंटों या मतदान करवाने वाले कर्मचारियों को डराया-धमकाया जाता है
2. मतदान केंद्रों पर कब्जा और अथवा गड़बड़ी फैलाई जाती है3. चुनाव प्रचार तथा लोगों से पैसा वसूलने के लिए गुंडों की मदद ली जाती है तो इसकी शिकायत करें।
मतदान केंद्रों और चुनाव प्रचार में गड़बड़ी की शिकायत-
 1. पीठासीन अधिकारी या निर्वाचन अधिकारी या जिला चु्नाव अधिकारी या मुख्य चुनाव अधिकारी या फिर निर्वाचन आयोग से शिकायत कर सकते हैं । 2. न्यायिक मजिस्ट्रेट से शिकायत कर सकते हैं। 3. लोकपाल नियुक्त हो तो उससे शिकायत कर सकते हैं। 4. हर हिंसक घटना की थाने में एफआईआर दर्ज करा सकते हैं ।
चुनाव में बेहिसाब पैसों के खर्च की शिकायत-
1. स्थानीय आयकर अधिकारियों से शिकातय करें। 2. निर्वाचन आयोग के चुनाव प्रेक्षक से शिकायत करें।
3. निर्वाचन आयोग के चुनाव व्यय प्रेक्षक से शिकायत करें। 4. राज्य सरकार से शिकायत करें।
5. पुलिस से शिकायत करें। 6. न्यायिक मजिस्ट्रेट शिकायत करें। 7. निर्वाचन अधिकारी या जिला चुनाव अधिकारी या मुख्य चु्नाव अधिकारी या निर्वाचन अधिकारी से शिकायत करें।
बिना अनुमति दीवारों पर नारों के खिलाफ शिकायत- राजनैतिक दलों द्वारा दीवारों और घरों पर नारे लिखना अपराध है। इसके खिलाफ निम्नलिखित कार्रवाईयां की जा सकती हैं...
1. राजनैतिक दल के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करा सकते हैं
2. संपत्ति के नुकसान का सिविल दावा दर्ज करा सकते हैं3. निर्वाचन आयोग के प्रेक्षकों से शिकायत कर सकते हैं। 4. निर्वाचन अधिकारी या जिला चुनाव अधिकारी या मुख्य चुनाव अधिकारी से शिकायत कर सकते हैं5. पुलिस से शिकायत कर सकते हैं ।
लाउडस्पीकर के गलत इस्तेमाल पर शिकायत- चुनावों के दौरान निर्धारित समय के अलावा अथवा बहुत ऊंची आवाज में लाउज स्पीकरों के इस्तेमाल के खिलाफ निम्नलिखित से शिकायत कर सकते हैं...
1. जिला प्रशासन से शिकायत कर सकतें हैं। 2. पुलिस से शिकायत कर सकते हैं। 3. निर्वाचन आयोग के प्रेक्षक से शिकायत कर सकते हैं। 4. निर्वाचन अधिकारी या जिला निर्वाचन अधिकारी या निर्वाचन आयोग से शिकायत कर सकते हैं।
यदि कानून व्यवस्था के प्रभारी अथवा कर्मचारी आपको परेशान करते हैं तो...
1. जिला चुनाव अधिकारी या निर्वाचन अधिकारी या मुख्य चुनाव अधिकारी या निर्वाचन आयोग से शिकायत करें। 2. राज्य के पुलिस महानिदेश के शिकायत करें। 3. राज्य के मुख्य सचिव से शिकायत करें। 4. संघ सरकार के गृहमंत्रालय से शिकायत करें। 5. मतदान करवा रहा सरकारी कर्मचारी अगर अपने राजनैतिक झुकाव की वजह से अपना दायित्व ठीक से नहीं निभाता है तो आप पुलिस अथवा न्यायिक मजिस्ट्रेट से उसकी शिकायत कर सकते हैं।

20.1.13

जेल के डर से रसूखदारों के बिगड़ते हैं तबीयत

न्यायपालिका में न्याय सभी के लिए बराबर है चाहे अमीर हो या गरीब। नेता हो या अभिनेता। राजा हो या रंक। गुनाह किया है और कोर्ट में जुर्म साबित हो गया तो सजा भी भोगनी होती है। अपराधियों को सजा मिलती है इसीलिए तो लोग न्यायपालिका पर विश्वास करते है। कहते है भगवान के घर देर जरूर है पर अंधेर नहीं है इसी तरह हमारी कानूनी व्यवस्था है, देर जरूर होती है अंधेर नहीं। दोषियों को एक न एक दिन अपने अंजाम तक पहुंचा के ही दम लेती है। चाहे वह कितने ही बड़े ओहदे में ही क्यों न हो। न्यायपालिका में अविश्वास तब होता है जब कोई बड़े ओहदे का अधिकारी या कोई नेता अपना जुर्म अंत तक साबित नहीं होने देता है, गुनाह पर झूठ का परदा ढकने के लिए अपने पहुंच और ओहदे का इस्तेमाल करते है। राजनीतिक संरक्षण लेते है। साक्ष्य को मिटाने की पूरी कोशिश होती है। गुनाहों में परदा डालने के लिए अफसरों पर दबाव बनाया जाता है। तमाम तरह की कोशिश नाकम होने के बाद यदि दोष साबित हो जाते है और जेल जाने की बारी आती है तो दिल का दौरा, सिने में दर्द, सांस लेने में तकलीफ, उम्र का हवाला देकर सजा से बचने की कोशिश शुरू हो जाती है। यानी जब तक गुनाहों पर परदा पड़ा है आराम की जिंदगी, पकड़े गये तो बीमारियां घेर लेती हैं। हाल ही में शिक्षक भर्ती घोटाले में दोषी करार दिए गए हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश सिंह चौटाला जेल पहुंचने के बाद कभी सीने में दर्द की शिकायत कर रहे हैं तो कभी निजी अस्पताल में भेजने की जिद। सीने में दर्द की शिकायत के बाद उन्हें शनिवार शाम सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया। दूसरी तरफ, चौटाला ने अदालत से खुद को मेदांता हॉस्पिटल रेफर करने की मांग की। ओमप्रकाश चौटाला, पुत्र अजय चौटाला व मामले के अन्य दोषी अधिकारियों को तिहाड़ जेल लाया गया है। सीने में दर्द व सांस लेने में तकलीफ की शिकायत के बाद उन्हें शुक्रवार शाम को डीडीयू अस्पताल में भर्ती कराया गया था। जांच के बाद डॉक्टरों ने वापस तिहाड़ जेल भेज दिया था। शनिवार दोपहर को उन्होंने फिर सीने में दर्द व सांस लेने में तकलीफ की शिकायत की। एक बार फिर उन्हें डीडीयू में भर्ती कराया गया, जहां दो घंटे उनका इलाज चला। 78 वर्षीय चौटाला ने सीबीआई की विशेष अदालत में अर्जी देकर अपनी उम्र और बीमारियों का हवाला देकर मेदांता अस्पताल में ही इलाज करवाने की मांग की। शिक्षक भर्ती घोटाले मामले में अदालत ने 16 जनवरी को हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओपी चौटाला सहित 55 आरोपियों को दोषी करार दिया था। अब दोषियों ने अपनी उम्र, बीमारी, पारिवारिक जिम्मेदारियों आदि का हवाला देते हुए कम सजा देने की मांग की। सजा से बचने के लिए बीमारियों का बहाना करने का तो जैसे बड़े रसूखदार लोगों में चलन शुरू हो गया है। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री का बीमारी के नाम पर आराम फरमाना और सजा से बचने के लिए उम्र की दुहाई देना तो नेताओं में आम बात हो चुकी है। इससे पहले भी कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने भी जेल जाते ही बीमार हो गये थे और अस्पताल में भर्ती थे। घोटाले और रिश्वतखोरी करते समय हस्ट-पुस्ट रहने वाले ये नेता जेल यात्रा करने के दौरान ही बीमार हो जाते है। जेल से बहार आते ही फिर हस्ट-पुस्ट हो जाते है। अभी हमरे देश की जेलों की इतनी दुर्दशा नहीं हुई है कि जेल में जाते ही गंभीर बीमारी हो जाये। जबकि भारत में आम और खास के लिए जेलों में भी अलग-अलग बैरक है। उनकों में जेल ही तमाम तरह की सुख सुविधाएं मुहैया करा दी जाती है फिर भी बीमारी का बहाना। जेल जाते ही अच्छे-अच्छों को नानी याद आ जाती है ये तो सुना था पर अब तो जेल जाते ही बीमारी याद आती है वाली कहावत ज्यादा सुनने को मिलेगी, क्योंकि बारी-बारी सभी नेताओं की यही दशा होने वाले वाली है। ऐसा ही 2जी स्पेक्ट्रम मामले में सीबीआई की समन मिलते ही पूर्व टेलिकॉम मंत्री ए. राजा का अचानक तबीयत खराब हो गया था। सरकारी सुख सुविधाओं में रहने के बाद भी अचानक तबीयत होना, वो भी कानूनी झटका लगने के बाद। अब झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की बात करे तो चार हजार करोड़ के घोटाले को लेकर जब आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय की टीम पूछताछ करने लगी तो उनकी भी तबीयत अचानक खराब हो गई। कोड़ा घोटाला करने के वक्त तक तो भले-चंगे थे किन्तु पूछताछ के दौरान अपनी तबीयत खराब होने की शिकायत करने लग गये। उन्हें रांची के अपोलो अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। कई नेता तो गिरफ्तारी की वारंट जारी होते ही अग्रिम जमानत लेकर बैठ जाते है। कानून बनाने वाले उस कानून का तोड़ भी जानते है। उन्हें तो यह पहले ही पता होता है हमारे उपर लगे आरोप भी अस्थाई है क्योंकि शासन भी अस्थाई ही होती है। ज्यादा से ज्यादा पांच साल तक जेल और छूटने के बाद फिर वही खेल। अब न्याय व्यवस्था आम और खास के लिए एक कहां रही। आम आदमी अपने गुनाहों को आसानी से स्वीकार कर लेते है। सजा भोग अपने गुनहों पर पश्चाताप करते है। किन्तु खास अपराधी तो अपना अपराध स्वीकार करने के बजाय न्यायपालिका के कमजोरियों का लाभ उठाते हैं। सजा से बचने के हथकंडे अपनाते है। माननीय उच्च न्यायलय को संज्ञान में लेकर इन मामलों को गंभीरता से लेना चाहिए की अचानक ही क्यों बीमार वे हो जाते है। विचार करने का विषय है बीमार कैदी ही खुद ही कहता है कि मुझे फला बीमारी है मुझे फला अस्पताल में इलाज के लिए जाने दो। मरीज के बजाय वे एक डॉक्टर की तरह स्वास्थ्य सलाह स्वयं के लिए देने लगते है। जेल में बंदियों की तरह रहना तो दूर वहा का खाना-पानी, स्वास्थ्य सुविधाएं सब कुछ वीआईपी। जेल का कानून आम और खास के लिए एक होनी चाहिए। राजा से अपराध हुई तो महज एक भूल और प्रजा ने किया गुनाह हो गया। अपराधियों की सजा में उनके ओहदे को तवज्जों नहीं दी जानी चाहिए। गुनाह किये है तो सजा भी मिले। सजा में भी आरक्षण परंपरा की शुरूवात नहीं होनी चाहिए।

18.1.13

नियम-कायदों को ताक में रखकर कमल विहार

रायपुर विकास प्राधिकरण की कमल विहार योजना कछुए की चाल से अपना आकार ले रहा है। शुरू से ही विवादों में रहा कमल विहार में शासन को क्या विशेष रूचि है ये तो वे ही जाने। तमाम नियमों को ताक में रख कर विरोध और विवादों को अनदेखा कर विभागिय मंत्री-अफसर कमल खिलाने को आमद हैं। कमल विहार क्षेत्र से निकले नहर भी अब विलुप्त हो चुका है आने वाले बरसात में डूण्डा, बोरियाखुर्द, कांदूल, काठाडीह, पुरेना के किसानों को सिचाई के लिए अब नहरों से पानी नहीं मिल पायेगी।
गर्मी के दिनों में गांवों के तालाबों को भी अब सुखा ही रहना पड़ेगा क्योंकि गंगरेल से उनका संपर्क टूट चुका है। बोरियाखुर्द के गजराज बांध को भी जल संकट से जूझना होगा। बांध से निकले वाली बोरिया नाली भी टूट चुकी है। अनेक किसानों को कमल विहार क्षेत्र में न होते हुए भी कमल विहार का दुख झेलना है क्योंकि इन्ही रस्तों से होकर तो उन तक सिचाई के लिए पानी उपलब्ध होते है। स्वार्थ से फलीभूत होकर चलाये जा रहे कमल विहार योजना में न जाने और कितने नियमों को ताक में रख काम किया जावेगा। खैर सरकार उनकी है जो चाहे करें। 
भू-स्वामियों की हो मुनाफे में हिस्सेदारी - इस योजना के बारे में शासन पहले ही कह चुका है कि इसमें किसानों और भू-स्वामियों से किसी भी तरह से विकास राशि नहीं ली जायेगी किन्तु सरकार धनराशि लेने के बजाय जो भूमि ले रही वही अनमोल धन है। यदि वास्तव में यह योजना गरीबों और छोटे भू-स्वामियों के हित में है तो भूमि विकास के नाम पर अधिग्रहित भूमि में प्राधिकरण द्वारा प्लाट बेचकर जो मुनाफा कमाई जायेगी उसमें भी भू-स्वामियों को शेयर मिलना चाहिए। सीधे-साधे किसानों को विकसित भूखंड देने का प्रलोभन देकर सहमति पत्र भरवाया गया। सिर्फ सहमति पत्र के आधार पर किसानों से उनकी भूमि की रजिस्ट्री भी करवा दिया जा रहा है ताकि बाद में किसानों का मन न बदलें। किसान और छोटे भू-स्वामी विकसित भूखंड पाने के लोभ में अपना जमीन गवां रहे है। रायपुर विकास प्राधिकरण की कमल विहार का कोई भी हिस्सा अभी पूरी तरह से तैयार भी नहीं हुआ और किसानों के नाम की जमीन का रजिस्ट्री भी हो गया है। कुछ मामले कोर्ट में है। टेंडर भी निकलने शुरू हो गये है।
बसे बसाए घर से बेघर हो रहे बांसिदें- राविप्रा अपने अहम और हठ योजना को पूरा करने के लिए पूरी ताकत के साथ डूण्डा, देवपुरी, बोरिया खुर्द, लालपुर, डूमरतराई की कृषि भूमि को समतल कर अब ग्रामीणों के मकानों को तोड़ने की तैयारी कर रही है। कमल विहार क्षेत्र में बड़ी संख्या में ग्रामीणों के पक्के मकान है जिन्हे नोटिस देकर मकान खाली करने को कहा जा रहा है। इनकी मंशा से तो यही लगता है कि वे गांवों की छोटी-छोटी मकानों को गंदी बस्ती समझते और कमल विहार के सुंदरता में बाधक मान कर तोड़ा जा रहा है। यदि सचमुच में वे लोगों को बसाना चाहते है तो फिर उनको विकसित भूखंड देने का लोभ देकर बसे बसाए घर से बेघर क्यों किया जा रहा है। उनके घरों को ही कमल विहार के मुताबिक विकसित करके घर को टूटने से  बचाया जा सकता है। अब तक के विकास कार्यों को देखे तो केवल रोड़ ही रोड़ नजर आ रहे है। जो कभी पेड़ों और फसलों से आच्छादित धरा हुआ करती थी आज वहां रोड़ निर्माण से धूल के उड़ते गुबार देखे जा सकते है। रोड़ निमार्ण में जो बाधक बन रहा है उसे रास्ते से हटा दिया जा रहा है। कुछ दिन पहले ही डूण्डा के छ: मकानों को गिरा कर वहां की जमीन को समतल करके रोड़ बना दिया गया। किन्तु वहीं मकानों के पास ही संचालित अंग्रेजी शराब दुकान को हाथ तक नहीं लगाया गया है।
कमल विहार की शान डूण्डा शराब दुकान ! - डूण्डा का अंग्रेजी शराब दुकान रायपुर-धमतरी मेन रोड़ में होने कारण रोज शराबियों के मेले लगे रहते हैं। उस रास्ते से रोजाना हजारों मजदूर रोजी-रोटी कमाने के लिए रायपुर आते है और काम करके वापस लौटते समय अपनी आधी कमाई रोज उस शराब दुकान में लुटा देते है। आस-पास के गांव की औरतें तथा लड़कियां रायपुर आते-जाते हुए सिर झुकाकर रास्ते से गुजरती है क्योंकि शराब दुकान में आए दिन असमाजिक तत्वों का जमावड़ा, असुरक्षित माहौल गाली-गलौच और रोड़ तक शराबियों की हुजूम लगी रहती है। कमल विहार परियोजना बनने से लोगों में एक उम्मीद नजर आई थी कि अब शायद ये शराब दुकान बंद हो जायेगी। किन्तु अभी तक शराब दुकान का बाल भी बांका नहीं हुआ है। कहीं ऐसा न हो कि कमल विहार से शराब दुकान को हटाकर डूण्डा, बोरियाखुर्द या सेजबाहर के बस्ती में स्थानांतरित कर दिया जाए, शासन के मनमानी रवैये तो यही कयास लगाया जा सकता है। डूण्डा अंग्रेजी शराब दुकान को पूरी तरह से बंद किया जाना चाहिए उसे कहीं और स्थानांतरित नहीं किया जाए। शासन जितनी फूर्ती कमल विहार प्रोजेक्ट में दिखा रही उतनी ही सूस्ती शराब दुकान हटाने में लगा रही है। यदि आप स्वच्छ और सुंदर शहर बसाने की मंशा लेकर नया बस्ती बसा रहे है वहां शराब दुकान क्यों चलाने दिया जा रहा है समझ से परे है। बस्ती बसी नहीं कि लुटेरे आ गये वाली कहावत से तो सरकार चार कदम आगे ही चल रहे हैं क्योंकि अभी बस्ती बसी ही नहीं और शराब दुकान पहले ही खुलवा दी गई। इसीलिए शराब दुकान को कमल विहार की शान कहें तो ज्यादा उचित होगा।

17.1.13

पाक के नापाक मंसूबे


भारतीय नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान का फायरिंग करना और सैनिकों का निर्दयता पूर्वक हत्या कर शरीर से धड़ का काट कर ले जाना न सिर्फ अनैतिक है बल्कि अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन भी है। पाकिस्तान सैनिकों द्वारा बार-बार सीमा पर गोलीबारी कर सीजफायर का उल्लंघन किया जाना तो बदस्तूर जारी है। सीमा पर न सिर्फ गोलीबारी करते है, भारतीय सीमा में आंतकवादी संगठनों का घुसपैठ कराने में पाकिस्तानी सैनिकों का ही हाथ हैं। सीमा के नजदीक सुरक्षा में तैनात जवानों का ध्यान हटाने के लिए गोलीबारी करते है और जिसका आड़ लेकर पाकिस्तान के आतंकी भारत की सीमा में प्रवेश करते है। इन आशंकाओं से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि पाक सैनिक ही भारत में अशांति फैलाने के लिए आतंकी भेजते है। यदि ऐसा नहीं है तो नियंत्रण रेखा पर सीजफायर के बाद भी बिना कोई ठोस कारण और रक्षा मंत्रालय को सूचना दिये ही गोलीबारी क्यों। यह बात तो पहले ही साफ हो चुका है कि पाक सैनिकों का पाकिस्तानी रक्षा मंत्रालय और शासन से ज्यादा जेहादियों की हुक्म की तामिल करना ज्यादा वफादारी समझते है इसीलिए वे आतंकियों के बारे में जानकारी रखते हुए भी भारत की मदद नहीं करते है या यह कहा जाए की पाक ही भारत में अशांति फैलाने के लिए जानबूझ कर करते है। हाल ही में हुए फायरिंग ने यह भी साबित कर दिया कि पाक सैनिक एक सिपाही की तरह नहीं लड़ते ही बल्कि की खुंखार पशुओं की तरह नरसंहार कर सैनिकों का सर काट कर ले जाते है। आखिर ये किस युद्ध कला में सिखाई जाती है कि दुश्मन को बिना आगाह किये ही चुपचाप तरीके से वार करना। वह भी उन दिनों जबकि भारत-पाक के बीच शांत समझौता जारी है। निश्चित ही ये सैन्य कला नहीं बल्कि आतंकियों के पैतरे हंै, जिसे अपना कर पाकिस्तानी सैनिक भारतीय सीमा पर गोलीबारी कर जवानों का नरसंहार कर करते है। अब भारत को भी अमेरिकी कार्यप्रणाली को अपनाने की जरूरत है आखिर कब तक दुश्मनों के वार सहते रहेंगे। शंाति वार्ता तभी सार्थक होगी जब दोनों ही तरफ के लोग शांति चाहेंगे। पाक तो शांति चाहता ही नहीं। बार-बार उलंघन से तो यही लगता है कि वो हमें ललकार रहा है कि आवो दम है लड़ों, पर हम है कि अब भी शांति और दोस्ती के लिए बाहं फैलाये खड़े है। दोस्ती के नाम पर दोस्त के ही पीठ में छूरा घोपते है पाक। अब इस तरह की पाकिस्तनी सेना की कार्रवाई को नजरअंदाज करना भारत की कमजोरी होगी। दुश्मन को और कितना अवसर देंगे सुधरने के लिए जबकि दुश्मन तो सुधरना ही नहीं चाहता है। तत्कालिन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में जो शांति वार्ता शुरू हुई थी, लाहौर बस सेवा, सिजफायर, व्यापारिक आवागमन किसी में भी पाकिस्तान ने इमानदारी नहीं दिखाई है। कभी तानाशाही तो कभी आतंकी संगठनों के कारण शांति समझौता में बाधा उत्पन्न हुई। इतने व्यवधानों के बाद भी भारत जो रास्ता निकालता है वह अमन का ही होता है। इस समझौते में पाक की नियत अब भी पाक नहीं है। यदि भारत की जगह अमेरिका या चीन जैसे देशों के साथ वादाखिलाफी की होती तो आज तक पाकिस्तान का नामोनिशा ही मिट चुका होता है। इस मामले में अमेरिका की नीति ठीक है जो दुश्मनों को घर में घुस कर मारने की हिम्मत करता है। तालिबान और ओसामा के साथ जो अमेरिका ने किया वही अब भारत को पाक के साथ करना होगा। भारत भले ही अमेरिका जितनी सैन्य शक्ति संपन्न नहीं है पर पाक से कम भी नहीं है। पाकिस्तान तो अपनी ताकत दिखा कर बार-बार भारत को चुनौती दे रहा है। अब जो ताकत भारत के पास है उसका उपयोग करने की जरूरत है। तोप और गोला बारूद बना-बना कर अरबों की धनराशि सैन्य सुरक्षा में लगाने के बाद क्या उन अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग नहीं होना चाहिए। सिर्फ दिखावे के लिए और प्रदर्शनी में रखने के लिए बनाये हो तो बाद अलग है, यदि अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए परमाणु बम और टैकों का निमार्ण हुआ है तो फिर सीमा पर सैनिकों का नरसंहार किस लिए कराया जा रहा है। प्रदर्शनी में रखे अस्त्रों को मैदान में आने दो, जो उनमें शक्तियां है उसे हकीकत बनने देने की जरूरत है। दुश्मन अब किताबी औजार से नहीं डरने वाला है शक्ति है तो दिखाओ शायद यही कहना हो सकता है पाक सैनिकों का। तभी तो पाकिस्तानी सैनिक अपना तकत दिखाने में पीछे नहीं रहते है। जरूरत पड़ी तो आत्मघाती भी बनने में कोई कसर नहीं छोड़ते है। अब तो शांति समझौता से आगे कुछ और कार्यवाही होनी चाहिए अन्यथा पाकिस्तानियों की हौसलों में और पर लग जायेंगे। आज जो वो देश के बाहर बैठे कर रहे है वही काम वह हमरे देश के भीतर घुस कर करेंगे। अभी तब कि जितनी भी आतंकी वारदात भारत में हुए है उस पर तो पाक ने साफ इंकार कर दिया है वे आंतकी पाकिस्तानी थे। पाकिस्तान के नागरिक होने का पुख्ता सबुत के बाद भी पाक द्वारा आतंकियों को पाकिस्तनी होने से झूटलाता रहा है। ऐसे में विश्वातघात करने वाले देश की करतूतों को आखिर कब तक बरदास्त किया जाता रहेगा, समय रहते सबक सिखना ही उचित है।

POPULAR POSTS